यादव बनाम यादव की चुप्पी, यादव बनाम ठाकुर में सक्रियता: सवालों के घेरे में गगन यादव की राजनीति

उत्तर प्रदेश के दो जिलों—सुल्तानपुर और बलिया—में हुई दो अलग-अलग हत्याओं ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, बल्कि सियासी और सामाजिक हलकों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। दोनों मामलों में पीड़ितों का उपनाम एक—यादव—होने के बावजूद, इन घटनाओं पर समाजसेवी और निजी संस्था के अध्यक्ष गगन यादव की भूमिका को लेकर अब गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
दो हत्याएं, दो रवैये?
कुछ दिन पहले सुल्तानपुर जिले में अमन यादव नामक युवक की हत्या कर दी गई। आरोप है कि यह वारदात यादव जाति के ही कुछ लोगों द्वारा की गई। इस घटना के बाद क्षेत्र में आक्रोश तो दिखा, लेकिन कई सामाजिक-राजनीतिक चेहरों की खामोशी भी चर्चा का विषय बनी। इसके विपरीत, इसके कुछ ही दिनों बाद बलिया जिले में आयुष यादव की ठाकुर बिरादरी से जुड़े लोगों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस मामले ने राज्य-स्तर पर सियासी भूचाल ला दिया। इसी घटना में गगन यादव स्वयं मृतक आयुष यादव के परिजनों से मिलने पहुंचे, संवेदना जताई और न्याय की बात कही।
यहीं से उठता है बड़ा सवाल
अब जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि— जब सुल्तानपुर में यादव बनाम यादव की घटना हुई, तब गगन यादव क्यों नहीं पहुंचे? और जब बलिया में यादव बनाम गैर-यादव (ठाकुर) की घटना हुई, तब उनकी सक्रियता क्यों दिखी? लोगों का कहना है कि अगर गगन यादव खुद को सामाजिक न्याय और पीड़ितों की आवाज़ बताते हैं, तो फिर जातिगत समीकरण के आधार पर संवेदनाओं का चयन क्यों? चयनात्मक सक्रियता या राजनीतिक गणित? आलोचकों का आरोप है कि गगन यादव की भूमिका अब सामाजिक कम और राजनीतिक ज़्यादा नजर आने लगी है। उनका कहना है कि— जहां मामला यादव समाज के अंदरूनी विवाद का होता है, वहां वे दूरी बना लेते हैं लेकिन जहां यादव बनाम दूसरी जाति का नैरेटिव बनता है, वहां वे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं इसी वजह से अब यह कहा जाने लगा है कि यह समाजसेवा नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की रणनीति है।
समाजसेवी की कसौटी क्या होनी चाहिए?
एक समाजसेवी या सामाजिक संगठन के अध्यक्ष से अपेक्षा होती है कि वह—हर पीड़ित के साथ खड़ा हो, चाहे आरोपी किसी भी जाति या समुदाय का हो न्याय की मांग में एक-सा पैमाना अपनाए पीड़ा को राजनीतिक लाभ के तराजू में न तौले लेकिन मौजूदा घटनाक्रम में गगन यादव की भूमिका को लेकर यही सवाल उठ रहा है कि क्या उनकी सक्रियता सिद्धांतों पर आधारित है या समीकरणों पर? राजनीति और समाज दोनों में यह माना जाता है कि कई बार चुप्पी भी एक पक्ष चुनने के बराबर होती है। सुल्तानपुर की घटना में गगन यादव की अनुपस्थिति अब उसी चुप्पी के रूप में देखी जा रही है, जिसने उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
दो हत्याएं, दो ज़िले, दो यादव युवक—लेकिन प्रतिक्रिया में फर्क। यही फर्क आज गगन यादव को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। अब देखना यह है कि—क्या गगन यादव इन सवालों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे? या यह धारणा और गहरी होगी कि उनकी राजनीति चयनात्मक संवेदना पर टिकी है? क्योंकि अंततः समाज यह पूछ रहा है— न्याय जाति देखकर होगा या पीड़ा देखकर?

 

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