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ईरान-अमेरिका सीजफायर विवाद, शहबाज शरीफ के दावे पर उठे गंभीर सवाल

ईरान और अमेरिका के बीच हुए कथित सीजफायर समझौते को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के दावे पर अब अमेरिका और ईरान दोनों की ओर से सवाल उठने लगे हैं, खासकर लेबनान को लेकर दिए गए बयान पर.पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अमेरिका-ईरान के बीच कथित मध्यस्थता वाली सीजफायर डील की फिर से पोल खुल गई है. शहबाज शरीफ ने बुधवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया था कि ईरान, अमेरिका और अमेरिका के सहयोगी देश लेबनान समेत सभी देशों ने दो हफ्ते के लिए हमले रोकने और वार्ता के लिए युद्धविराम पर सहमति दे दी है. लेकिन अब अमेरिकी व्हाइट हाउस ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि लेबनान कभी भी इस दो हफ्ते के सीजफायर समझौते का हिस्सा नहीं था और इसकी जानकारी सभी पक्षों को पहले ही दे दी गई थी.
दरअसल, युद्धविराम की घोषणा के बाद भी इजरायल लगातार लेबनान में हेजबुल्लाह के ठिकानों पर तेजी से हमले कर रहा था. इसके विरोध में पहले ईरान ने सीजफायर समझौते के तहत खोले गए स्ट्रेट ऑफ होरमुज को फिर से बंद कर दिया. इसके बाद ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने शहबाज शरीफ की X पोस्ट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए उसमें लेबनान और अमेरिका के सहयोगी देशों वाली लाइन को हाईलाइट किया.सैयद अब्बास अराघची ने X पर लिखा कि ईरान-अमेरिका युद्धविराम की शर्तें पूरी तरह स्पष्ट हैं और अमेरिका को तय करना होगा कि वह वास्तव में युद्धविराम लागू करेगा या फिर इजरायल के जरिए युद्ध जारी रखेगा. उन्होंने कहा कि दोनों चीजें साथ नहीं चल सकतीं. उन्होंने आगे कहा कि दुनिया लेबनान में हो रही हिंसा को देख रही है और अब फैसला अमेरिका के हाथ में है. पूरी दुनिया यह देख रही है कि वह अपने वादों पर कितना कायम रहता है.ऐसे में अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब अमेरिका और इजरायल दोनों ही लेबनान को सीजफायर का हिस्सा नहीं मान रहे हैं, तो क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जानबूझकर ईरान को गुमराह किया था? या फिर अमेरिका ने अंतिम समय पर अपने वादे से पीछे हटते हुए समझौते का उल्लंघन किया?ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने इस बीच बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि बातचीत शुरू होने से पहले ही दस प्रस्तावों में से तीन का उल्लंघन किया जा चुका है, ऐसे में द्विपक्षीय सीजफायर और बातचीत का कोई औचित्य नहीं रह जाता. गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका के प्रति ईरान का ऐतिहासिक अविश्वास बार-बार किए गए ऐसे उल्लंघनों की वजह से ही है और दुर्भाग्य से एक बार फिर वही स्थिति सामने आई है.

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