लद्दाख को मिल सकता है नया निर्वाचित निकाय, केंद्र के साथ संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर बातचीत तेज
लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा और स्थानीय शासन व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार तथा क्षेत्रीय नेताओं के बीच बातचीत का नया दौर शुरू होने जा रहा है। लेह में होने वाली उप-समिति की बैठक में केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक नए निर्वाचित निकाय के गठन और विशेष संवैधानिक संरक्षण के प्रस्तावों पर चर्चा होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य लद्दाख की स्थानीय जरूरतों, प्रशासनिक अधिकारों और क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए शासन का एक अलग मॉडल तैयार करना है।
इस बैठक में लेह एपेक्स बॉडी (LAB), कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA), लद्दाख के सांसद हाजी हनीफा जान और गृह मंत्रालय के अधिकारी शामिल होंगे। इससे पहले 9 सितंबर को नई दिल्ली में हुई बैठक में लद्दाख के लिए एक विशेष शासन मॉडल और संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर चर्चा हुई थी।
लद्दाख में कैसी होगी नई शासन व्यवस्था?
लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष शेरिंग दोरजे के मुताबिक, बैठक में मुख्य रूप से दो मुद्दों पर बातचीत होगी। पहला, लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों का ढांचा और दूसरा, केंद्र शासित प्रदेश के स्तर पर एक निर्वाचित निकाय का गठन।
दोरजे ने बताया कि लद्दाख के नेता पिछली बैठक में गृह मंत्रालय की ओर से रखे गए प्रस्तावों पर अपना लिखित जवाब सौंपेंगे। साथ ही वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि केंद्र की ओर से किस तरह के संवैधानिक अधिकार और संरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव है।
9 सितंबर की बैठक के बाद लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बताया था कि दोनों पक्ष एक ऐसे विशेष मॉडल पर सहमत हुए हैं, जिसे लद्दाख की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा। प्रस्तावित विधायी संस्था न तो किसी राज्य की विधानसभा जैसी होगी और न ही केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूद पारंपरिक विधानसभा के समान।
उपराज्यपाल के अधिकारों पर भी उठेंगे सवाल
लद्दाख के क्षेत्रीय नेताओं की मांग है कि प्रस्तावित निर्वाचित निकाय की शक्तियां स्पष्ट होनी चाहिए। इसके साथ ही वे उपराज्यपाल की भूमिका और निर्वाचित संस्था के साथ अधिकारों के बंटवारे पर भी जानकारी चाहते हैं।
LAB के नेताओं ने हाल में लिए गए कुछ नीतिगत फैसलों को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब तक नई व्यवस्था और संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर सहमति नहीं बन जाती, तब तक नौटोर भूमि के नियमितीकरण, शराब की दुकानों और पर्यटन से जुड़े बड़े नीतिगत फैसलों को टालने पर विचार किया जाना चाहिए।
क्षेत्रीय नेताओं का तर्क है कि ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय निर्वाचित निकाय के गठन और उसके कामकाज शुरू होने के बाद लिए जाने चाहिए। हालांकि, इन मांगों पर अंतिम फैसला केंद्र और संबंधित पक्षों के बीच बातचीत के बाद ही होगा।
LAB और KDA की क्या हैं प्रमुख मांगें?
लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस प्रस्तावित निर्वाचित संस्था को व्यापक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने की मांग कर रहे हैं।
उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
- वित्तीय अधिकार: कर लगाने, बजट बनाने और सरकारी खर्च पर नियंत्रण।
- सार्वजनिक धन: कर्ज, सार्वजनिक निधियों, समेकित निधि और आकस्मिक निधि से जुड़े अधिकार।
- प्रशासनिक नियंत्रण: गृह मामलों से संबंधित विषयों पर निर्वाचित व्यवस्था के जरिए नियंत्रण।
- संवैधानिक संरक्षण: लद्दाख की स्थानीय पहचान, हितों और जरूरतों के अनुरूप विशेष सुरक्षा उपाय।
क्षेत्रीय नेताओं का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था को उचित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर विचार किए जाने की संभावना भी जताई गई है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि आवश्यक होगी।
अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा उपायों पर चर्चा
लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक संरक्षण की मांग लंबे समय से उठती रही है। मौजूदा बातचीत में अनुच्छेद 371 के प्रावधानों के तहत सुरक्षा उपायों पर चर्चा का उल्लेख किया गया है। हालांकि, अनुच्छेद 371 के अलग-अलग प्रावधान विभिन्न राज्यों के लिए विशेष व्यवस्थाएं निर्धारित करते हैं। लद्दाख के लिए किसी नई व्यवस्था का स्वरूप और उसका कानूनी आधार संबंधित पक्षों के प्रस्ताव तथा संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार लद्दाख के लिए किस प्रकार का औपचारिक प्रस्ताव रखती है और उसमें स्थानीय प्रतिनिधित्व, भूमि, रोजगार तथा प्रशासनिक अधिकारों को लेकर क्या प्रावधान शामिल किए जाते हैं।
लद्दाख में विकास परियोजनाओं पर भी जोर
संवैधानिक व्यवस्था पर बातचीत के बीच लद्दाख में बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी लगभग 3,350 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं में हवाई अड्डे, सड़क, बिजली, विरासत संरक्षण और जल उपलब्धता से संबंधित काम शामिल हैं।
इनमें लेह हवाई अड्डे के यात्री टर्मिनल भवन, 298 किलोमीटर लंबी निम्मू-पदुम-दारचा सड़क, हानू की 9 मेगावाट की लघु जलविद्युत परियोजना और दाह-हानू-खालत्सी बिजली ट्रांसमिशन लाइन जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, प्राचीन शैलचित्रों के संरक्षण के लिए पेट्रोग्लिफ संरक्षण पार्क और ‘प्रोजेक्ट हिम सरोवर’ के तहत 40 गांवों में जल स्रोत विकसित करने की पहल का भी उल्लेख किया गया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य क्षेत्र में संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पानी की उपलब्धता को बढ़ावा देना है।
अब आगे क्या होगा?
लेह में होने वाली बातचीत से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि केंद्र सरकार और लद्दाख के क्षेत्रीय नेताओं के बीच प्रस्तावित निर्वाचित निकाय की शक्तियों तथा संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लेकर कितनी सहमति बन पाती है।
फिलहाल यह प्रस्तावित व्यवस्था है, अंतिम संवैधानिक ढांचा नहीं। इसकी वास्तविक शक्तियां, उपराज्यपाल की भूमिका और वित्तीय अधिकार तभी स्पष्ट होंगे, जब केंद्र सरकार औपचारिक प्रस्ताव सामने रखेगी और आवश्यक संवैधानिक व कानूनी प्रक्रिया पूरी होगी।

