दिल्ली में लड़कियों के एक प्रदर्शन के दौरान उठे इस नारे ने समाज में एक बहस छेड़ दी थी। सवाल पुरुषों के व्यवहार पर उठाए गए, तमाम मर्दों को कटघरे में खड़ा किया गया। लेकिन आज मैं एक दूसरा सवाल पूछना चाहता हूं। जब एक महिला पर अपने ही पति की हत्या में शामिल होने का आरोप साबित हो जाए, जब एक इंसान की जिंदगी बेरहमी से खत्म कर दी जाए, तो क्या उस अपराध के खिलाफ भी ऐसी ही आवाज उठेगी? क्या न्याय की मांग करते समय हम अपराधी का लिंग देखेंगे, या अपराध की गंभीरता?
उत्तर प्रदेश के मेरठ से सामने आया बहुचर्चित नीला ड्रम केस एक बार फिर चर्चा में है। इस मामले में अदालत ने, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है। यह सिर्फ एक हत्या की खबर नहीं है बल्कि यह एक परिवार के उजड़ने, भरोसे के टूटने और एक मासूम बच्ची के भविष्य से जुड़ा मामला भी है। मर्चेंट नेवी में अधिकारी सौरभ राजपूत की जिंदगी का अंत जिस तरह हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर दिया था।बताया गया कि 3 मार्च 2025 की रात मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके में सौरभ राजपूत की हत्या कर दी गई। इस मामले में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला आरोपी थे।जांच में सामने आए घटनाक्रम के मुताबिक, हत्या के बाद सौरभ के शव को धारदार हथियार से टुकड़ों में काटा गया और नीले ड्रम में रखकर सीमेंट और बालू से बंद कर दिया गया।जरा सोचिए, एक परिवार, एक वैवाहिक रिश्ता और एक जिंदगी… जिसका अंत इतना भयावह हुआ की जिसने इस खबर को सूना जिसने पढ़ा और जिसने जाना उसकी रूह तक काँप गई । यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हत्या किसने की। सवाल यह भी है कि आखिर कोई इंसान इस हद तक कैसे पहुंच जाता है कि दूसरे इंसान की जिंदगी छीन लेता है? इस मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, घटना के अगले दिन मुस्कान अपनी बड़ी बेटी पीहू को अपनी मां के घर छोड़कर साहिल के साथ हिमाचल प्रदेश चली गई थी। करीब 13 दिन बाद वह मेरठ लौटी और अपनी मां को सौरभ की हत्या के बारे में बताया। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बच्ची भी है, जिसके लिए यह सब केवल एक सनसनीखेज खबर नहीं, बल्कि उसके जीवन से जुड़ी एक गहरी त्रासदी है।
अब अदालत ने दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई है, तो इस फैसले पर चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां एक बात साफ होनी चाहिए—कानून की नजर में अपराध की गंभीरता महत्वपूर्ण है, अपराध करने वाले का महिला या पुरुष होना नहीं।अगर किसी महिला पर हत्या का अपराध साबित होता है, तो सिर्फ महिला होने के आधार पर उसे जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती। ठीक उसी तरह किसी पुरुष को भी केवल पुरुष होने के कारण अपराधी नहीं माना जा सकता।फांसी की सजा अत्यंत गंभीर दंड है। इसके खिलाफ अपील और कानून में उपलब्ध अन्य उपायों का अधिकार भी न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा है। अदालतों में आगे जो भी प्रक्रिया होगी, उसका फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होना चाहिए।न्याय न भीड़ के नारों से तय होना चाहिए, न किसी के महिला या पुरुष होने से।
और अब लौटते हैं उस बहस पर, जो दिल्ली में लड़कियों के प्रदर्शन के दौरान उठे नारों से शुरू हुई थी। जब महिलाओं के साथ अपराध होता है, जब किसी लड़की के साथ अन्याय होता है, तब आवाज उठनी ही चाहिए। उनकी सुरक्षा, सम्मान और न्याय के लिए आवाज उठाना जरूरी है।लेकिन मैं उन लोगों से भी एक सवाल पूछना चाहता हूं, जो पुरुषों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए पूरे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।क्या अपराध के खिलाफ आवाज उठाने का पैमाना सभी के लिए एक जैसा नहीं होना चाहिए? अगर किसी पुरुष ने किसी महिला के साथ अपराध किया है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग होनी चाहिए। और अगर किसी महिला पर किसी पुरुष की हत्या का अपराध साबित होता है, तो उस अपराध पर भी उतनी ही गंभीरता से बात होनी चाहिए। क्या एक कचौड़ी दो समोसा इन मर्दों का क्या भरोसा या एक सूता दो चाय मर्द जात हाय हाय जैसे नारों के जरिये मर्दों पर सवाल उठाने वाली वो लड़कियां अपने सोशल एकाउंट पर आकर मुस्कान जैसी लड़कियों के लिए भी दो शब् बोलेंगी ? क्या ऐसी लड़कियों के लिए भी कुछ नारे बनाएंगी ? और क्या वह यह स्वीकार कर पाएंगी कि अपराधी किसी भी लिंग का हो सकता है? यह सवाल महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ नहीं है। यह सवाल उस सोच के खिलाफ है, जो कभी किसी एक पूरे वर्ग को दोषी ठहरा देती है और कभी किसी अपराध पर चुप रह जाती है।
याद रखिए, सौरभ राजपूत भी किसी के बेटे थे, किसी के पति थे और एक बच्ची के पिता थे।उनकी जिंदगी वापस नहीं आ सकती। उनके परिवार ने जो खोया है, उसकी भरपाई कोई फैसला नहीं कर सकता। लेकिन न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि अपराध की सुनवाई निष्पक्ष हो और कानून के अनुसार न्याय मिले। सुनने में ये आ रहा है कि मुस्कान अब हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है और चर्चा ये भी हो रही है की कोर्ट महिला होने के नाते मुस्कान के लिए थोड़ी हमदर्दी दिखा सकती है ….लेकिन इस मामले में फैसला लिंग देखकर नहीं, अदालत में पेश सबूतों और कानून के आधार पर होना चाहिए। और समाज की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी अपराध को केवल इसलिए नजरअंदाज न करे कि आरोपी महिला है, या केवल इसलिए किसी को दोषी न ठहराए कि वह पुरुष है।

