‘प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्’—अर्थात शासक का सुख और हित जनता के सुख और हित में ही निहित है। राजधर्म का यही सिद्धांत किसी भी सरकार की असली परीक्षा संकट के समय करता है। उत्तर प्रदेश में आई बाढ़ के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रियता को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
बाढ़ सिर्फ खेतों और घरों को नहीं डुबोती, बल्कि लोगों के भीतर असुरक्षा और भय भी पैदा करती है। पानी बढ़ने के साथ लोगों को अपने घर, फसल, पशुधन और परिवार की चिंता सताने लगती है। ऐसे वक्त में सरकार की मौजूदगी और राहत व्यवस्था लोगों के लिए भरोसे का सबसे बड़ा आधार बनती है।
उत्तर प्रदेश में जब कई नदियां खतरे के निशान से ऊपर पहुंचीं और कई इलाकों में गांव जलमग्न हुए, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों से केवल रिपोर्ट लेने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई और जमीनी निरीक्षण किया और राहत एवं बचाव अभियानों की सीधे निगरानी की। अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए कि प्रभावित लोगों तक मदद पहुंचाने में किसी भी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री की सक्रियता का असर प्रशासनिक अमले पर भी दिखाई दिया। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों के साथ जिला प्रशासन के अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और कई जगह खुद पानी में उतरकर बचाव अभियान की निगरानी करते नजर आए। इससे यह संदेश गया कि प्रशासन बाढ़ प्रभावित लोगों को अकेला नहीं छोड़ रहा है।
सरकार के मुताबिक, इस बार बाढ़ से निपटने की तैयारियों में तकनीक और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था पर खास जोर दिया गया। राहत आयुक्त कार्यालय की ओर से जुलाई और अगस्त के दौरान 591 करोड़ से अधिक अलर्ट मैसेज भेजे गए। इन संदेशों के जरिए लोगों को मौसम और बाढ़ के संभावित खतरे की जानकारी पहले से दी गई, ताकि वे समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें।
आपदा के दौरान 1070 हेल्पलाइन भी अहम कड़ी बनी। फंसे लोगों की सूचना मिलने के बाद उनकी लोकेशन के आधार पर जिला प्रशासन, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों को मौके पर भेजा गया। इससे राहत और बचाव अभियानों में प्रतिक्रिया का समय कम करने में मदद मिली।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, राहत अभियान के दौरान करीब 20 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। प्रभावित परिवारों के लिए छह लाख से अधिक लंच पैकेट और एक लाख से ज्यादा बाढ़ राहत किट वितरित की गईं। यानी राहत अभियान का फोकस सिर्फ लोगों को सुरक्षित निकालने तक नहीं रहा, बल्कि उनके भोजन और जरूरी सामान की व्यवस्था पर भी रखा गया।
बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इसे देखते हुए प्रभावित इलाकों में क्लोरीन टैबलेट और ओआरएस पैकेट का वितरण किया गया। साथ ही प्रभावित जिलों में प्रभारी मंत्रियों को जिम्मेदारी देकर राहत सामग्री के वितरण और व्यवस्थाओं की निगरानी सुनिश्चित की गई।
बाढ़ जैसी आपदा में सरकार की असली परीक्षा सिर्फ राहत सामग्री के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि संकट के वक्त कितनी तेजी से लोगों तक मदद पहुंचती है। उत्तर प्रदेश में अलर्ट सिस्टम, हेल्पलाइन, रेस्क्यू टीम और राहत वितरण को एक साथ सक्रिय रखने की रणनीति ने प्रशासनिक तंत्र को लगातार जमीन पर बनाए रखा।
सरकार के मुताबिक, इस बार की बाढ़ में अब तक जनहानि और पशुहानि नहीं हुई है। अगर यह स्थिति कायम रहती है तो यह प्रदेश की आपदा प्रबंधन व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी। बाढ़ ने जहां कई इलाकों में मुश्किलें बढ़ाईं, वहीं राहत और बचाव की तैयारियों ने यह दिखाने की कोशिश की कि तकनीक, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व मिलकर काम करें तो बड़ी प्राकृतिक आपदा के प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

