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गुरूर : कांग्रेस से निर्दलीय और अब भाजपा में जिम्मेदारी: पलारी चुनाव में मीना व ललिता साहू की भूमिका पर उठे सवाल, नगर पंचायत पलारी के चुनावी रण में दल बदल की राजनीति बनी चर्चा का विषय

कांग्रेस से निर्दलीय और अब भाजपा में जिम्मेदारी: पलारी चुनाव में मीना व ललिता साहू की भूमिका पर उठे सवाल

नगर पंचायत पलारी के चुनावी रण में दल बदल की राजनीति बनी चर्चा का विषय

गुरूर। नवगठित नगर पंचायत पलारी के प्रथम निकाय चुनाव के बाद राजनीतिक गलियारों में एक नया मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। कांग्रेस से जुड़ाव रखने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ चुकीं मीना सत्येन्द्र साहू और ललिता पीमन साहू को भाजपा द्वारा चुनावी जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।
स्थानीय राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों नेताओं का पूर्व राजनीतिक इतिहास कांग्रेस से जुड़ा रहा है। बाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ऐसे में भाजपा संगठन द्वारा उन्हें चुनावी प्रभारी अथवा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे जाने को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी सवाल उठने लगे हैं।
नगर पंचायत पलारी चुनाव के दौरान भाजपा ने अध्यक्ष पद सहित वार्डों में जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रदेश और जिला स्तर के नेताओं के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी कई लोगों को चुनावी जिम्मेदारी दी गई थी। इसी क्रम में मीना सत्येन्द्र साहू और ललिता पीमन साहू की सक्रियता भी चर्चा में रही।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा बदलने और किसी भी दल में शामिल होने का अधिकार है। हालांकि लंबे समय से पार्टी के लिए कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि संगठन में नए शामिल हुए लोगों को तत्काल बड़ी जिम्मेदारी देना कितना उचित है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा समर्थकों का तर्क है कि चुनाव जीतने के लिए समाज के हर वर्ग और प्रभावशाली व्यक्तियों को साथ जोड़ना आवश्यक होता है। यदि कोई व्यक्ति पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर संगठन से जुड़ता है तो उसे जिम्मेदारी देना संगठन का अधिकार है।
पलारी नगर पंचायत चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी यानेश साहू की अध्यक्ष पद पर जीत के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया है। चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक हलकों में यह बहस तेज हो गई है कि दल बदलकर आए नेताओं को संगठन में किस स्तर तक और कितनी जल्दी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
हालांकि इस पूरे मामले पर भाजपा संगठन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन चुनाव के बाद क्षेत्र में यह विषय राजनीतिक चर्चा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पलारी चुनाव ने केवल जीत-हार का परिणाम ही नहीं दिया, बल्कि संगठनात्मक निष्ठा, कार्यकर्ताओं के सम्मान और दल बदल की राजनीति जैसे मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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