*गुरूर नगर पंचायत में खुला भ्रष्टाचार का बाजार: 1.70 लाख लेकर 42 हजार की रसीद, सीएमओ-बाबू कह रहे हमने नहीं लिया!*
बिल्डिंग परमिशन के नाम पर लूट, नागरिक घूम-घूम कर थक गए, सिस्टम आंख मूंदे बैठा
*गुरूर।
नगर पंचायत का मतलब “जनसेवा” होता है। पर गुरूर नगर पंचायत में इसका मतलब बन गया है जितनी जेब कट सके, काट लो। यहां बिल्डिंग परमिशन के नाम पर भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा है। नगर पंचायत नियम-कानून ताक पर रखकर अवैध उगाही का अड्डा बन चुका है। सीएमओ, बाबू, इंजीनियर – सब अपनी-अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं और जनता चक्कर काट-काट कर बर्बाद हो रही है। लूट सको तो लूट मौका ना जाए छूट की तर्ज पर यहां काम चल रहा है।
दरअसल, मामला गुरूर नगर पंचायत वार्ड क्रमांक 1 के निवासी मनहरण सिन्हा का है। आरोप है कि अपना मकान बनाने के लिए जब उन्होंने बिल्डिंग परमिशन मांगी तो नगर पंचायत के इंजीनियर और बाबू ने सीधे 3 लाख 70 हजार रुपए की डिमांड रख दी। सौदा 1 लाख 70 हजार में तय हुआ। ये रकम नगर पंचायत के बाबू खिलू साहू के पास जमा भी कर दी गई। इसके बाद शुरू हुआ “घुमाने” का खेल। महीनों तक रसीद के लिए दफ्तर के चक्कर कटवाए गए। और जब आखिरकार रसीद मिली तो होश उड़ गए। 1 लाख 70 हजार की जगह सिर्फ 42 हजार 613 रुपए की रसीद थमा दी गई। बाकी 1.27 लाख रुपए कहां गए? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
*सबसे बड़ा झूठ: हमें कुछ पता ही नहीं*
जब इस घोटाले का पर्दाफाश हुआ तो नगर पंचायत का पूरा अमला एक सुर में बेकसूर बन गया। बाबू खिलू साहू का कहना है कि मुझे कोई ज्यादा रकम नहीं दी गई। रसीद काट दी थी, पर आवेदक लेने ही नहीं आया। 1.70 लाख देने की बात गलत है। कोई लेन-देन हुआ ही नहीं। वाह! गजब है भाई… पैसे ले लो, रसीद कम की काट दो और फिर कह दो कि आवेदक रसीद ही लेने नहीं आया।
वहीं सीएमओ श्रीनिवास पटेल ने भी पल्ला झाड़ लिया। उनका कहना है कि मुझे ज्यादा रुपए लेकर कम की रसीद देने की जानकारी नहीं है। अगर कोई कर्मचारी डिमांड करता है तो शिकायत करो। जांच करवाएंगे। दोषी मिला तो कार्रवाई होगी। मतलब जब तक कोई लिखित में शिकायत न करे, तब तक भ्रष्टाचार चलता रहेगा? सीएमओ साहब सच्चाई तो यही है कि आपके कंटोल में या तो नगर पंचायत के कर्मचारी नहीं है या फिर आप जानकार भी अंजान बन रहे हैं।
*इंजीनियर गायब, अध्यक्ष भी बेबस*
सबसे मजेदार बात ये है कि नगर पंचायत का इंजीनियर इस मामले की जानकारी मीडिया तक पहुंचने के बाद फोन ही रिसीव नहीं कर रहा। सवालों से भाग रहा है। और अध्यक्ष तक मामला पहुंचने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अध्यक्ष मामले की जांच करवाने की बात कह रहे हैं। वहीं नगर में अब आम चर्चा है कि नगर विकास, पर्यावरण, सड़क बाधा और भवन अनुज्ञा के नाम पर जमकर अवैध उगाही हो रही है। रेट फिक्स है। बिना पैसे दिए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। नगर पंचायत में कोई भी काम बिना लेनदेन के नहीं होता
*सवाल जनता के*
1. अगर लेन-देन नहीं हुआ तो बाबू के पास 1.70 लाख जमा करने कौन गया था?
2. अगर रसीद काट दी थी तो आवेदक को दी क्यों नहीं गई?
3. 1.27 लाख का अंतर किसकी जेब में गया?
4. सीएमओ को “जानकारी नहीं” है तो वो किस बात के सीएमओ हैं?
*सरकारी दफ्तर यानी भ्रष्टाचार, रकम दो काम कराओ*
गुरूर नगर पंचायत आज भ्रष्टाचार की पाठशाला बन गई है। यहां ईमानदारी से टैक्स भरने वाला पिस रहा है और रिश्वत देकर काम कराने वाला राज कर रहा है। अब गेंद कलेक्टर और जिला प्रशासन के पाले में है। जनता मांग कर रही है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो। बैंक स्टेटमेंट, रजिस्टर और सीसीटीवी खंगाले जाएं। तभी तो पता चलेगा कि आखिर रुपया गया कहां… वैसे भी सरकारी दफ्तर भ्रष्टाचार को लेकर हमेशा बदनाम रहा है। यहां पैसा दोगे तभी काम होगा।
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